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धन संपत्ति के मामले में आपकी सोच...?

मैंने अपने कॉलेज के वर्ष लॉस एन्जेलस के एक बढ़िया होटल में सेवक के रूप में बिताये। वहाँ एक तकनीकी कार्यकारी अतिथि के रूप में अक्सर आया करता था। वह काफ़ी प्रतिभावान था, उसने लगभग 20 वर्ष से कुछ ही अधिक की आयु में वाई- फ़ाई का एक मुख्य घटक डिज़ाइन कर पेटेंट किया था। वह कई कंपनियां शुरु करके बेच चुका था और बेतहाशा कामयाब था। धन संपत्ति के साथ उसका जो संबंध था, उसे मैं असुरक्षा और बचकानी मूर्खता का मेल कहूँगा। वह सौ डॉलर के नोटों की कई इंच मोटी गड्डी साथ लेकर घूमता था, जिसे वह हर किसी को दिखाता था, फिर चाहे वे देखना चाहते हों या नहीं। वह बिना किसी संदर्भ के अपनी धन सम्पदा की खुलकर डींग मारता, ख़ासकर जब वह नशे में धुत होता। एक दिन उसने मेरे एक सहकर्मी को कई हज़ार डॉलर की रकम दी और कहा, "गली में जो ज़वाहरात की दुकान है, वहाँ जाओ और 1000 डॉलर के कुछ सोने के सिक्के लेकर आओ।" एक घंटे बाद, हाथ में सोने के सिक्के लिये, वह कार्यकारी और उसके दोस्त एक डॉक के चारों तरफ़ इकट्ठा हो गये जो प्रशांत महासागर के सामने था। फिर उन्होंने उन सिक्कों को पानी में फेंकना शुरू कर दिया। वे उन सिक्कों को

लीडर तीन तरीकों से शासन करते हैं

लीडर तीन तरीक़ों से शासन करते हैं। आदेश द्वारा, परामर्श द्वारा और सर्वसम्मति द्वारा। नेतृत्व का पारंपरिक तरीक़ा आदेशात्मक है। लीडर आदेश देता है और हर कर्मचारी से उनके पालन की उम्मीद की जाती है। आज लीडर समझ गए हैं कि आदेश की ज़रूरत बताए बिना या उस बारे में परामर्श लिए बिना आदेश जारी करने से कर्मचारी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित नहीं होते हैं। 

जैसा अमेरिकी सेना की पहली महिला सर्जन मेजर जनरल गेल पोलॉक (रिटायर्ड) कहती हैं, “अगर आप लोगों को कोई ऐसी चीज़ करने का आदेश देते हैं, जिसे वे नहीं समझ पाते तो वे इसमें अपना सब कुछ नहीं झोंकेंगे। सबसे महान प्रदर्शन और साहस तब बाहर निकलता है, जब आप उन्हें यह बता देते हैं कि यह क्यों महत्त्वपूर्ण है।”

नेतृत्व करने का दूसरा तरीका परामर्श द्वारा नेतृत्व करना है। परामर्श-आधारित निर्णय वह होता है, जहाँ आप लोगों से उनकी सलाह व राय माँगने के बाद निर्णय लेते हैं। यह आदेशात्मक नेतृत्व की तुलना में ज़्यादा प्रेरक होता है। लोग जानते हैं कि अंतिम निर्णय आप ही ने लिया है, लेकिन वे इस तथ्य की कद्र करेंगे कि निर्णय लेने से पहले आपने उनसे परामर्श लिया। भले ही वे अंतिम निर्णय से सहमत ना हों, लेकिन इस बात की ज़्यादा संभावना होती है कि इस परामर्श की वजह से वे उसका पालन करेंगे।

सर्वसम्मति लोगों को निर्णय में शामिल करने में और आगे तक जाती है। इस मामले में लीडर अंतिम निर्णय नहीं लेता है, बल्कि अंतिम निर्णय पूरा समूह लेता है। समूह हर काम के सकारात्मक और नकारात्मक बिंदुओं पर बातचीत करता है और फिर इस बारे में एकमत होता है कि कौन सा काम किया जाए।

लीडर तीनों तरीक़ों का इस्तेमाल करते। किसी अत्यंत महत्त्वपूर्ण निर्णय पर बातचीत करते समय वे यह स्पष्ट कर देते हैं कि यह किस तरह का निर्णय है। हर निर्णय सर्वसम्मति से या आदेशात्मक तरीके से लेना उचित नहीं है, हालाँकि सर्वसम्मति वाले निर्णयों के अपने फ़ायदे होते हैं, लेकिन लीडर इसकी आड़ में अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकता। महत्त्वपूर्ण यह है कि कर्मचारी इस बात को समझ लें कि कब परामर्श वाले या सर्वसम्मति वाले निर्णय की ज़रूरत है और कब आदेशात्मक निर्णय लेना बेहतर है।

लीडर्स को मुश्किल निर्णय लेने के पैसे मिलते हैं। कई बार इसका मतलब आदेश देना होता है, लेकिन सर्वश्रेष्ठ लीडर यह भी जानते हैं कि किसी विचार के स्वामी होने और उस पर बातचीत में सहभागी होने के बीच एक सीधी कड़ी होती है। लीडर्स को यह अहसास होता है कि लोग किसी विचार संबंधी चर्चा में जितने संलग्न होंगे, वे संभवतः उस पर अमल करने के प्रति उतने ही ज्यादा समर्पित होंगे।

जहाँ तक संभव होता है, लीडर आदेश देने से बचते हैं। लीडर हमेशा लोगों को विचारों के बारे में सोचने, बात करने और विचार-विमर्श करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि लोग जितने ज़्यादा संलग्न होंगे, उतनी ही ज़्यादा संभावना है कि वे अंतिम निर्णय का समर्थन करने के प्रति समर्पित होंगे।

परामर्श या सर्वसम्मति से नेतृत्व करने के लिए उच्च विश्वास के माहौल की ज़रूरत होती है, जिसमें लोगों को सशक्त बनाया जाए और वे सच बोलने या ज़िम्मेदारी लेने से ना घबराएँ। परामर्श या सर्वसम्मति वाले नेतृत्व के लिए सही परिवेश इस तरह बनाया जा सकता है।

कोई भी ख़राब काम नहीं करना चाहता, लेकिन इसके बावजूद समस्याएँ आती रहती हैं। अगर कोई समस्या आए, तो उससे तुरंत निपटें। शामिल व्यक्ति से सीधे बात करें और शांति से समस्या के समाधान खोजें। किसी को दोष ना दें, आरोप ना लगाएँ या फ़ैसला ना सुनाएँ। इस बात के काफ़ी आसार हैं कि समस्या उस कर्मचारी की वजह से उत्पन्न नहीं हुई हो, बल्कि इसकी जड़ कंपनी या सुपरवाइजर भी हो सकता है। समस्या का कारण चाहे जो हो, उसका पता लगाएँ और समाधान खोजें।

कर्मचारी बेहतर बनने का अवसर चाहते हैं। ऐसा परिवेश बनाएँ, जो ना सिर्फ़ ग़लतियों की अनुमति देता हो, बल्कि प्रदर्शन स्तर ऊपर उठाने में कर्मचारियों को प्रोत्साहित भी करता हो। 

आप नीचे दिए कदमों के ज़रिये कर्मचारियों को बेहतर बना सकते हैं :

1. बिलकुल शुरुआत से ही अपेक्षाओं को स्पष्ट कर दें। यह सुनिश्चित करें कि कर्मचारी सटीकता से जानते हों कि आप उनसे किन परिणामों की अपेक्षा करते हैं। उन परिणामों को यथासंभव निष्पक्ष बनाएँ।

2. प्रदर्शन को मापने योग्य पैमाने तय करें। याद रखें, “जिसे मापा जाता है, उसे ही किया जाता है।" हर काम के वित्तीय पैमाने तय करें।

3. कभी यह मानकर ना चलें कि कर्मचारी आपके निर्देशों को पूरी तरह समझ गया है। अपने कर्मचारियों को कोई काम या प्रोजेक्ट सौंपते समय यह सुनिश्चित करें कि वे उसे लिख रहे हों, फिर उनसे कहें कि वे आपको पढ़कर सुनाएँ कि आपने उन्हें कौन सा काम सौंपा है।

4. नियमित फ़ीडबैक दें। कर्मचारियों को बता दें कि वे क्या अच्छा कर रहे हैं। उन्हें बता दें कि वे किस चीज़ को बदल सकते हैं। और सुधार सकते हैं। फ़ीडबैक प्रेरणादायक होता है, क्योंकि इससे सामने वाले को यह संदेश मिलता है कि उसके काम में आपकी रुचि है। आप कितना अच्छा काम कर रहे हैं, इस बारे में अँधेरे में रहना प्रेरणाहीन होता है। सबसे बढ़कर, लोग अच्छी तरह किए गए काम की भावना से प्रेम करते हैं। उन्हें यह बता दें।

5. जब कोई समस्या खड़ी होती है, तो कई बार नाराज़ या अधीर होना आसान होता है। यह नज़रिया रखें कि स्पष्ट समस्याओं के बावजूद कर्मचारी ने सर्वश्रेष्ठ इरादे से काम किया है, फिर समस्या से शांति से और इस तरह निपटें, जिससे कर्मचारी अपमानित महसूस ना करे ।

6. कर्मचारी की आलोचना ना करें या किसी सार्वजनिक स्थान पर समस्या पर बातचीत ना करें। स्थिति पर बात करने के लिए कर्मचारी को अपने ऑफिस में बुलाएँ।

7. समस्या या ग़लतफ़हमी के बारे में बहुत विशिष्ट बनें। स्पष्टता से समझाएँ कि आप क्यों चिंतित हैं। कर्मचारी की बात पूरी सुनें। भले ही कर्मचारी रक्षात्मक बन जाए, लेकिन स्थिति के बारे में कर्मचारी का स्पष्टीकरण घटना को एक अलग रोशनी में दिखा सकता है।

8. यदि ग़लती कर्मचारी की है, तो इस बारे में स्पष्ट अपेक्षाएँ तय करें कि कर्मचारी का प्रदर्शन कैसे और कितना बेहतर बनना चाहिए। इससे ज़्यादा कुंठाजनक और प्रेरणाहीन कुछ भी नहीं है, जब यह बता दिया जाए कि चुनौती को सुलझाओ या समस्या को रोको, लेकिन यह ना बताया जाए कि कैसे।

9. कर्मचारी सटीकता से यह जानना चाहते हैं कि समस्या को दुरुस्त करने के लिए वे क्या कर सकते हैं। जाँच करें, कि क्या कर्मचारी ने वे फेरबदल कर लिए हैं, जिन पर वह सहमत हुआ था? फ़ीडबैक दें और आवश्यकता होने पर अतिरिक्त समर्थन भी दें।

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