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धन संपत्ति के मामले में आपकी सोच...?

मैंने अपने कॉलेज के वर्ष लॉस एन्जेलस के एक बढ़िया होटल में सेवक के रूप में बिताये। वहाँ एक तकनीकी कार्यकारी अतिथि के रूप में अक्सर आया करता था। वह काफ़ी प्रतिभावान था, उसने लगभग 20 वर्ष से कुछ ही अधिक की आयु में वाई- फ़ाई का एक मुख्य घटक डिज़ाइन कर पेटेंट किया था। वह कई कंपनियां शुरु करके बेच चुका था और बेतहाशा कामयाब था। धन संपत्ति के साथ उसका जो संबंध था, उसे मैं असुरक्षा और बचकानी मूर्खता का मेल कहूँगा। वह सौ डॉलर के नोटों की कई इंच मोटी गड्डी साथ लेकर घूमता था, जिसे वह हर किसी को दिखाता था, फिर चाहे वे देखना चाहते हों या नहीं। वह बिना किसी संदर्भ के अपनी धन सम्पदा की खुलकर डींग मारता, ख़ासकर जब वह नशे में धुत होता। एक दिन उसने मेरे एक सहकर्मी को कई हज़ार डॉलर की रकम दी और कहा, "गली में जो ज़वाहरात की दुकान है, वहाँ जाओ और 1000 डॉलर के कुछ सोने के सिक्के लेकर आओ।" एक घंटे बाद, हाथ में सोने के सिक्के लिये, वह कार्यकारी और उसके दोस्त एक डॉक के चारों तरफ़ इकट्ठा हो गये जो प्रशांत महासागर के सामने था। फिर उन्होंने उन सिक्कों को पानी में फेंकना शुरू कर दिया। वे उन सिक्कों को

Adolf Hitler का अपने राष्ट्र के प्रति समर्पण

हिटलर के शासनकाल का जर्मनी कुछ और था, और उससे पहले कुछ और रूप लिए हुए था, और अब जो कुछ है, वह उससे अलग हैं, तथा आने वाले समय में इससे भिन्न होगा। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, जर्मनी कई बार टूटा और फिर संगठित हुआ है, उसके टूटने और जुड़ने का क्रम चलता रहा है, पर वह एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में अब भी जीवित हैं। समय और इतिहास स्थिर नहीं है, जो एक क्षण पहले था, वह अब नहीं है, और अगले क्षण कुछ और ही होगा। हिटलर की बदनामी के तीन मुख्य कारण थे : 1. फासिस्टवादी विचारधारा  2. जातियतावाद और  3. युद्ध की मानसिकता यही वो तीन कारण जो उसे विश्व मानवता का शत्रु मानते थे। क्या वास्तव में हिटलर मानवता का शत्रु था ...  उसका अपनी मातृभूमि के प्रति अपार श्रद्धा और असीम गौरव का नाम ही सच्चा राष्ट्रवाद है, यदि राष्ट्रीय भावना जीवित है तो अंतरराष्ट्रीयवाद भी जीवित हैं, अपने देश से प्रेम और उसके प्रति निष्ठा देशवासी होने का स्वाभिमान, और देश के लिए बलिदान की भावना तथा राष्ट्र के लिए सर्वस्व निछावर करने की चाह जैसे गुणों का होना हमारा उद्देश्य होना चाहिए।