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अपने विचार और मिशन के बारे में सोचें

अपने विचार और मिशन के बारे में सोचें। डेनियल काहनेमन की पुस्तक थिंकिंग, फास्ट एंड स्लो पिछले कुछ वर्षों में लिखी गई सर्वश्रेष्ठ और सबसे ज़्यादा गहन चिंतन वाली पुस्तकों में से एक है। वे बताते हैं कि हमें अपने दैनिक जीवन में जिन बहुत सी स्थितियों का सामना करना पड़ता है, उनसे निपटने के लिए दो अलग-अलग प्रकार की सोच का इस्तेमाल करने की ज़रूरत होती है। तीव्र सोच का इस्तेमाल हम अल्पकालीन कामों, ज़िम्मेदारियों, गतिविधियों, समस्याओं और स्थितियों से निपटने के लिए करते हैं। इसमें हम जल्दी से और सहज बोध से काम करते हैं। ज़्यादातर मामलों में तीव्र सोच हमारी रोज़मर्रा की गतिविधियों के लिए पूरी तरह उचित होती है। दूसरी तरह की सोच का वर्णन काहनेमन धीमी सोच के रूप में करते हैं। इसमें आप पीछे हटते हैं और स्थिति के विवरणों पर सावधानीपूर्वक सोचने में ज़्यादा समय लगाते हैं और इसके बाद ही निर्णय लेते हैं कि आप क्या करेंगे। काहनेमन की ज्ञानवर्धक जानकारी यह है कि आवश्यकता होने पर भी हम धीमी सोच करने में असफल रहते हैं और इसी वजह से हम जीवन में कई ग़लतियाँ कर बैठते हैं। समय के प्रबंधन में उत्कृष्ट बनने और अपने

गुणों को विकसित करने की कला

लीडर्स कभी विकास करना नहीं छोड़ते। वास्तव में कुछ दशकों में लीडर्स पर किए गए सबसे वृहद् अध्ययनों में से एक में हमने यह पाया है कि सच्चे लीडर्स में विकास करने और आरामदेह दायरे में ना गिरने की क्षमता होती है। वे आजीवन विद्यार्थी होते हैं।

पढ़ना और अध्ययन करना और कोर्स करना नेतृत्व के गुण विकसित करने की कुंजी है। पढ़ना, अध्ययन करना  सभी लीडर पाठक होते हैं, हालाँकि उन पर हमेशा काम का बोझ रहता है, लेकिन वे कभी नई जानकारी ग्रहण करना नहीं छोड़ते हैं। वे कारोबारी पुस्तकें और पत्रिकाएँ पढ़ना या सम्मेलनों में जाना, विचार-विमर्श करना और नवीनतम जानकारी सीखना कभी बंद नहीं करते हैं।

जॉर्ज वॉशिंगटन एक मध्यवर्गीय परिवार में पैदा हुए थे, जिनके पास ज्यादा सुविधाएं नहीं थीं, लेकिन अंततः वे अमेरिकी सेना के सेनापति और अमेरिका के पहले राष्ट्रपति बने। अमेरिका की स्थापना के तूफानी दौर में भी वॉशिंगटन हमेशा अपने शालीन व्यवहार और शिष्ट अंदाज़ के लिए मशहूर थे। बहुत कम लोगों को यह पता है कि किशोरावस्था में उन्होंने एक पुस्तक पढ़ी थी, जिसने उनके लंबे जीवनकाल में उनके व्यवहार का मार्गदर्शन किया। इस पुस्तक का शीर्षक था द रूल्स ऑफ़ सिविलिटी एंड डिसेंट बिहेवियर इन कंपनी एंड कनवर्सेशन वॉशिंगटन ने इस पुस्तक के 110 नियम व्यक्तिगत नोटबुक में लिख लिए और इस नोटबुक को जीवनभर साथ रखा।

कई लीडर अपने रोल मॉडल की तलाश में दूसरे लीडर्स की जीवनियाँ और आत्मकथाएँ पढ़ते हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के डेविड मैक्लेलैंड ने युवाओं के चरित्र और व्यक्तित्व को आकार देने में रोल मॉडलों के प्रभाव पर शोध किया है। जैसा उन्होंने अपनी पुस्तक द एचीविंग सोसायटी में स्पष्ट किया, किसी व्यक्ति की युवा अवस्था में समाज जिन स्त्री-पुरुषों को रोल मॉडल मानता है, उनका प्रभाव उस व्यक्ति के चरित्र पर जीवनभर रहता है। बहरहाल, जो लोग महान लीडर बनते हैं, वे समाज के वर्तमान रोल मॉडलों से आगे तक जाते हैं, वे पढ़कर और अध्ययन करके इतिहास के सर्वश्रेष्ठ लीडर्स को खोजते हैं।

उन गुणों पर काम करें, जो आपमें नहीं हैं लोग नेतृत्व के कुछ गुणों के साथ पैदा हो सकते हैं, लेकिन उनमें कुछ गुणों की कमी हो सकती है। ज्यादातर महान लीडर इसलिए महान बने, क्योंकि उन्होंने पता लगाया कि उनमें नेतृत्व के कौन से गुण नहीं थे और फिर उन्हें हासिल करने का बीड़ा उठाया।

अमेरिका के संस्थापकों में से एक बेंजामिन फ्रैंकलिन ने भी कड़ी मेहनत करके नेतृत्व के गुण विकसित किए। फ्रैंकलिन स्वीकार करते थे कि छोटी उम्र में वे बहुत अप्रिय स्वभाव के थे, बहुत बहस करते थे और बुरा व्यवहार करते थे। ज़ाहिर है, यह उनकी सफलता में बाधक था। इसलिए उन्होंने जान-बूझकर अपने व्यक्तित्व को बदलने का बीड़ा उठाया। 

उन्होंने बैठकर तेरह गुण लिखे, जो वे हासिल करना चाहते थे और फिर वे इन गुणों के अनुरूप काम करना सीखने लगे। हर सप्ताह वे एक गुण को चुनकर उस पर ध्यान केंद्रित करते थे, जैसे सहनशीलता या शांति, लेकिन फ्रैंकलिन जानते थे, जिस तरह वॉशिंगटन जानते थे, कि नेतृत्व के गुण सिर्फ़ एक सप्ताह में ही नहीं आ जाते हैं। फ्रैंकलिन इन गुणों का अध्ययन करते रहे। 

उन्होंने अंततः किसी ख़ास गुण पर दो सप्ताह तक ध्यान केंद्रित किया, फिर तीन सप्ताह, फिर पूरे महीने। इसका नतीजा यह हुआ कि कभी रूखे और लोगों को विकर्षित करने वाले फ्रैंकलिन अमेरिका की तरफ़ से काम करने वाले सबसे प्रभावी कूटनीतिज्ञों में से एक बन गए। 

पेरिस में उन्होंने अत्यंत महत्त्वपूर्ण कूटनीतिक भूमिका निभाई, जिसकी बदौलत उन्हें अंतरराष्ट्रीय समर्थक मिले, जिनकी मदद के बिना अमेरिका इंग्लैंड जैसे शक्तिशाली राष्ट्र को नहीं हरा सकता था और यह सब तेरह गुणों पर काम करने से शुरू हुआ।

जब आप खुद को बेहतर बनाने के लिए काम कर रहे हों, तो ये तीन नियम याद रखें : 

 1. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कहाँ से आए हैं। फर्क सिर्फ़ इससे पड़ता है कि आप जा कहाँ रहे हैं। किसी कमज़ोरी की वजह से अगर आप अतीत में अवसर चूक गए हों या आपने ग़लतियाँ कर दी हों, तो चिंता ना करें। वह सब बीत चुका है। महत्त्वपूर्ण तो भविष्य है। आप पहले लीडर नहीं रहे हैं, इसका यह मतलब नहीं है कि आप आगे जाकर लीडर नहीं बन सकते।

2. अगर आप अपने जीवन को बेहतर बनाना चाहते हैं, तो आपको बेहतर बनना होगा। अगर आप लीडर बनना चाहते हैं, तो आपको नेतृत्व के गुण विकसित करने चाहिए। 

3. आप जो भी चीज़ सीखना चाहते हैं, सीख सकते हैं। आप जो भी बनना चाहते हैं, बन सकते हैं। 

बेंजामिन फ्रैंकलिन जैसे लीडर जानते थे कि वे क्या बनना चाहते हैं और फिर उन्होंने उस दिशा में मेहनत की।

लीडर हमेशा खुद को बेहतर बनाने की तलाश में रहते हैं। 

चार बुनियादी क़दम उठाकर आप नेतृत्व की अपनी योग्यताओं और गुणों को बेहतर बना सकते हैं :

1. कुछ चीजें ज़्यादा करें। वे चीज़ें ज़्यादा करें, जो आपके लिए ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हैं और जो लीडर के रूप में परिणाम हासिल करने के लिए ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हैं।

2. कुछ चीजें कम करें। साथ ही, उन गतिविधियों में कम समय देने का निर्णय लें, जो लीडर के रूप में आपकी सफलता में बाधक हैं।

3. वे चीजें करना शुरू करें, जो आप नहीं कर रहे हैं, लेकिन जो आपको करनी चाहिए। वे योग्यताएँ, सक्षमताएँ या ज्ञान कौन सा है, जिसकी मदद से आप सफल लीडर बन सकते हैं? उन्हें पहचानें और फिर या तो उन्हें हासिल करें या उन्हें सीखें।

4. कुछ चीजें करना बिलकुल छोड़ दें। हो सकता है कि कुछ गतिविधियाँ लीडर के रूप में आपके लक्ष्यों के लिए अब प्रासंगिक ही ना हों। पीछे हटकर देखें और आप जो हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, उसी दृष्टिकोण से अपनी सारी गतिविधियों का मूल्यांकन करें। हो सकता है, आपको यह पता लगे कि कभी जो महत्त्वपूर्ण था, वह अब महत्त्वपूर्ण नहीं है और उसमें आपको ज़रा भी समय नहीं लगाना चाहिए।

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