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अपने विचार और मिशन के बारे में सोचें

अपने विचार और मिशन के बारे में सोचें। डेनियल काहनेमन की पुस्तक थिंकिंग, फास्ट एंड स्लो पिछले कुछ वर्षों में लिखी गई सर्वश्रेष्ठ और सबसे ज़्यादा गहन चिंतन वाली पुस्तकों में से एक है। वे बताते हैं कि हमें अपने दैनिक जीवन में जिन बहुत सी स्थितियों का सामना करना पड़ता है, उनसे निपटने के लिए दो अलग-अलग प्रकार की सोच का इस्तेमाल करने की ज़रूरत होती है। तीव्र सोच का इस्तेमाल हम अल्पकालीन कामों, ज़िम्मेदारियों, गतिविधियों, समस्याओं और स्थितियों से निपटने के लिए करते हैं। इसमें हम जल्दी से और सहज बोध से काम करते हैं। ज़्यादातर मामलों में तीव्र सोच हमारी रोज़मर्रा की गतिविधियों के लिए पूरी तरह उचित होती है। दूसरी तरह की सोच का वर्णन काहनेमन धीमी सोच के रूप में करते हैं। इसमें आप पीछे हटते हैं और स्थिति के विवरणों पर सावधानीपूर्वक सोचने में ज़्यादा समय लगाते हैं और इसके बाद ही निर्णय लेते हैं कि आप क्या करेंगे। काहनेमन की ज्ञानवर्धक जानकारी यह है कि आवश्यकता होने पर भी हम धीमी सोच करने में असफल रहते हैं और इसी वजह से हम जीवन में कई ग़लतियाँ कर बैठते हैं। समय के प्रबंधन में उत्कृष्ट बनने और अपने

धारणा {सोच} ही व्यक्तित्व को बनाती है

जहां तक इंसान में छिपी संभावनाओं को जानने के क्षेत्र की बात है, तो नीज धारणा को बीसवीं सदी की सबसे बड़ी खोज कहा जा सकता है, इसी सोच के मुताबिक हर इंसान जन्म से ही अपने बारे में एक धारणा कायम करता जाता है, फिर आपकी अपने बारे में यही धारणा ही आपके अवचेतन मन के कंप्यूटर को संचालित करने वाला मास्टर प्रोग्राम बन जाती है,
 फिर यही तय करती हैं, कि आप क्या सोचेंगे, क्या कहेंगे, महसूस करेंगे, और क्या करेंगे। 

यही वजह है कि आपकी जिंदगी में सारा बदलाव खुद के बारे में धारणा बदलने और अपने बारे में अपनी दुनिया के बारे में सोचने का अंदाज बदलते ही दिखाई देने लगता है, वास्तविकता चाहे जो हो जब आप किसी बात को सही मान लेते हैं, तो वही आपके लिए सच बन जाती हैं। 

एरिस्टोटल ने लिखा है "जिस किसी भी बात का प्रभाव पड़ता है वही अभिव्यक्ति होती हैं। 

अगर आपको ऐसे माता-पिता मिले हैं, जिन्होंने आपको लगातार यह बताया है कि आप कितने अच्छे हैं, जो आपसे प्यार करते थे, आप का समर्थन करते थे, और आप में यकीन करते थे, आपने चाहे जो किया या न किया हो, ऐसे में आप इस विश्वास के साथ बड़े होगे, कि आप एक अच्छे और मूल्यवान व्यक्ति हैं, तीन वर्ष का होने तक यह विश्वास आपमें पैठ कर जाएगा, और दुनिया के साथ आपके रिश्ते का अहम हिस्सा बन जाएगा, उसके बाद, चाहे जो हो जाए, आपका खुद में ये यकीन कायम रहेगा, यही आपके लिए वास्तविकता बन जाएगी। 

अगर आपको ऐसे माता-पिता ने बड़ा किया, जो यह नहीं जानते थे कि उनके कहे गए शब्द और उनका व्यवहार आप पर कितना असर डाल सकता है, तो वे आपको नियंत्रित या अनुशासित करने के लिए तीखी आलोचना, असहमति या फिर शारीरिक या मानसिक सजा दे सकते हैं।

जब किसी को बचपन से ही निरंतर आलोचना का सामना करना पड़ता है, तो वह इस निष्कर्ष पर पहुंच जाता है, कि उसमें ही कोई खामी है, उसे यह समझ नहीं आता कि उसे क्यों लगातार आलोचना और सजा का सामना करना पड़ रहा है, उसे यह एहसास भी हो जाता है, कि माता-पिता उसके बारे में सही जानते हैं, और वह इसी काबिल है।

वह यह महसूस करने लगता है, कि उसकी कोई कीमत नहीं है, और न ही वह प्यार पाने के लायक है, उसकी कोई उपयोगिता नहीं है, इसलिए वह बिल्कुल महत्वहीन है।
किशोरावस्था और वयस्कपन में व्यक्तित्व संबंधी जितने भी समस्याएं होती हैं, मनोवैज्ञानिकों की राय में इन सभी की जड़ प्यार की कमी है।

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